पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ने इस बात पर प्रकाश डाला कि संसद तथा राज्य विधानमंडलों में बार-बार होने वाले व्यवधान लोकतांत्रिक संस्थाओं के समक्ष एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
लोकतंत्र में विधानमंडलों की भूमिका
- विधि-निर्माण: विधानमंडल ऐसे कानूनों का निर्माण करते हैं जो देश के शासन-प्रशासन को संचालित करते हैं तथा उभरती हुई सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक चुनौतियों का समाधान करते हैं।
- कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना: विधानमंडल परिचर्चा, प्रश्नकाल, विभिन्न प्रस्तावों तथा समितियों की समीक्षा के माध्यम से कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाते हैं।
- जनहितों का प्रतिनिधित्व: विधानमंडल निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को नागरिकों की चिंताओं, अपेक्षाओं एवं आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का मंच प्रदान करते हैं।
- नीतिगत विचार-विमर्श: विधानमंडल सार्वजनिक नीतियों, बजट तथा विकासात्मक प्राथमिकताओं पर सूचित एवं सार्थक चर्चा को प्रोत्साहित करते हैं।
संसदीय एवं विधायी व्यवधान
- संसदीय एवं विधायी व्यवधान से आशय बार-बार होने वाली कार्यवाही में रुकावटों, स्थगनों, विरोध-प्रदर्शनों तथा अव्यवस्थित आचरण से है, जो विधानमंडलों को अपने संवैधानिक दायित्वों का प्रभावी निर्वहन करने से रोकते हैं।
- यद्यपि स्वतंत्रता के प्रारम्भिक दशकों से ही व्यवधानों की घटनाएँ देखी जाती रही हैं, किंतु 1990 के दशक के बाद गठबंधन राजनीति के उदय तथा प्रतिस्पर्धात्मक संसदीय अवरोध की प्रवृत्ति के कारण इनकी आवृत्ति एवं तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- भारत में विधायी उत्पादकता में गिरावट:
- 17वीं लोकसभा (2019–2024) में 15 सत्रों के दौरान केवल 274 बैठकें आयोजित हुईं, जो भारतीय इतिहास में किसी भी पूर्ण कार्यकाल वाली लोकसभा के लिए सबसे कम थीं।
- संसदीय स्थायी समितियों को भेजे गए विधेयकों का अनुपात 15वीं लोकसभा (2009–14) में 71% से घटकर 16वीं लोकसभा (2014–19) में 27% तथा 17वीं लोकसभा (2019–24) में लगभग 16% रह गया।
- वर्ष 2025 के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा अपनी निर्धारित अवधि का केवल 29% तथा राज्यसभा केवल 34% समय तक ही कार्य कर सकी।
बार-बार होने वाले व्यवधानों के कारण
- राजनीतिक ध्रुवीकरण: बढ़ते राजनीतिक टकराव के कारण व्यवधान विरोध-प्रदर्शन के एक प्रमुख माध्यम के रूप में उभर रहे हैं।
- जन एवं मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति: राजनीतिक दल कभी-कभी विवादास्पद मुद्दों को प्रमुखता से उठाने तथा मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए व्यवधानों का सहारा लेते हैं।
- विवादास्पद मुद्दे एवं सहमति का अभाव: आर्थिक सुधार, अल्पसंख्यक अधिकार तथा संवैधानिक संशोधन जैसे महत्त्वपूर्ण नीतिगत विषय प्रायः विरोध, बहिष्कार एवं प्रदर्शन का कारण बनते हैं।
- कृषि कानून, 2020
- नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019
- वस्तु एवं सेवा कर (GST) का कार्यान्वयन, 2017
- जैसे मुद्दों ने व्यापक विरोध और सदन से बहिर्गमन (वॉकआउट) को शुरू किया।
- संसदीय मानदंडों के प्रति कमजोर प्रतिबद्धता: संसदीय परंपराओं, शिष्टाचार एवं मर्यादा के प्रति सम्मान में कमी अव्यवस्थित कार्यवाही को प्रोत्साहन देती है।
- सहमति निर्माण की सीमित प्रक्रिया: राजनीतिक दलों के बीच पर्याप्त संवाद और परामर्श के अभाव में विधायी गतिरोध एवं व्यवधान उत्पन्न होते हैं।
बार-बार होने वाले व्यवधान लोकतंत्र को कैसे प्रभावित करते हैं?
- कार्यपालिका की जवाबदेही पर प्रतिकूल प्रभाव : बार-बार स्थगन होने से प्रश्नकाल, संसदीय परिचर्चा एवं अन्य जवाबदेही तंत्रों की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
- विधायी उत्पादकता में कमी: व्यवधानों के कारण बहुमूल्य कार्य समय नष्ट होता है तथा महत्त्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में विलंब होता है।
- जनविश्वास में गिरावट: लगातार अव्यवस्थित आचरण से लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति नागरिकों का विश्वास कमजोर पड़ता है।
- वित्तीय लागत में वृद्धि: बार-बार होने वाले व्यवधानों से विधायी सत्रों के संचालन पर व्यय किए गए सार्वजनिक संसाधनों की हानि होती है।
आगे की राह
- संसदीय अनुशासन का सख्ती से पालन: विघटनकारी व्यवहार को हतोत्साहित करने के लिए विधायी नियमों एवं आचार संहिताओं का कठोरता से अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- समिति प्रणाली का सुदृढ़ीकरण: संसदीय समितियों को नीतियों एवं विधेयकों की विस्तृत समीक्षा हेतु अधिक अधिकार एवं संसाधन प्रदान किए जाने चाहिए।
- रचनात्मक विपक्ष को प्रोत्साहन: राजनीतिक दलों को अवरोधकारी रणनीतियों के स्थान पर सार्थक परिचर्चा एवं नीतिगत सहभागिता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- नागरिक सहभागिता को प्रोत्साहन: जनभागीदारी में वृद्धि से पारदर्शिता, जवाबदेही एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को सुदृढ़ किया जा सकता है।
निष्कर्ष
- बार-बार होने वाले व्यवधान विधायी प्रभावशीलता को कमजोर करते हैं, लोकतांत्रिक जवाबदेही को क्षीण करते हैं तथा जनविश्वास को प्रभावित करते हैं। अतः संसदीय मर्यादा, रचनात्मक विमर्श एवं संस्थागत सुदृढ़ीकरण को प्रोत्साहन देना आवश्यक है, ताकि ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्रभावी रूप से साकार किया जा सके।
Source: TH
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